श्री काशी गुरुकुल सेवा न्यास

"संगच्छध्वम् संवद्ध्वम्, सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे, संजानानामुपासते।।." समानो मंत्रः समिति समानी, समानं मनः सह चित्तमेषाम्।समानी व आकूतिः समाना हृदयानि व, समानवस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति।"

दीक्षान्तमंगलानुशासन / उद्बोधन मन्त्र


सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमद। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्। देवपितृकार्यभ्यां न प्रमदितव्यम्। मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि, तानि सेवितव्यानि, नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचरितानि, तानि त्वयोपास्यानि, नो इतराणि। श्रद्धया देयम्। अश्रद्धयादेयम्। श्रिया देयम्। हृया देयम्। संविदा देयम्। भिया देयम्। एष आदेशः एष उपदेशः। एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम् एवम् चैतदुपास्यम्।

संक्षिप्त इतिहास

स्व० पं० हरिशंकर मिश्र जी “जो सभी लोगों के शैक्षिक, सामाजिक एवं आर्थिक विकास हेतु निरन्तर कार्य करते रहते थे तथा अपने स्वस्थ मनःमस्तिष्क में अपनी व्यक्तिगत / पारिवारिक संकल्पों / कार्यों के साथ-साथ समाज एवं राष्ट्रहित का निरन्तर चिंतन भी बनाये रखते थे तथा उसे पूरा करने के लिए यथाशक्ति अपनी सत्यनिष्ठा से अहर्निश संलग्न रहते थे” के काशीलाभ / मुक्तिलाभ हो जाने के कारण उनकी स्मृति में श्रीमती मोती देवी के द्वारा श्रीकाशी गुरुकुल सेवा न्यास की स्थापना की गयी । यद्यपि पण्डित जी के जीवन काल में ही उनके द्वारा जनहित में यह संस्था सन् 2001 में स्थापित कर दी गयी थी परन्तु विधिवत् स्थापना (पंजीकृत) 2016 में की गयी। अपने पति स्व० हरिशंकर मिश्र जी के आदर्शों एवं पदचिन्हों पर चलते हुए इस न्यास की स्थापना के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण थे-

  1. समाज के साधनहीन व्यक्तियों के जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं- भोजन, शिक्षा एवं आवास की व्यवस्था करना।
  2. शिक्षित बेरोजगारों को उनकी योग्यता के अनुरूप तकनीकी एवं व्यावहारिक ज्ञान प्रदान कर उन्हें रोजगार का अवसर उपलब्ध कराना।
  3. समाज को आत्मचिन्तन के लिए तत्पर एवं तैयार करने हेतु, समाज में परस्पर भाई-चारा बनाये रखने एवं समाज को सुशिक्षित करने में लिंग भेद, जाति-पाँति, धर्म-सम्प्रदाय, ऊँच-नीच, स्पृश्य-अस्पृश्य की भावना को तिरोहित करते हुए जनहित के कार्यों को संचालित करना।
  4. समाज को न्याय के सत्पथ पर चलते हुए अधिकाधिक लाभ प्रदान करने हेतु विभिन्न विधाओं में समाज को शिक्षित किये जाने की आवश्यकता को देखते हुए विभिन्न संस्थाओं एवं समितियों का गठन किया जाना आवश्यक समझकर इसकी सम्पूर्ण व्यवस्था के लिए एक कल्याणकारी न्यास की विधिवत् (पंजीकृत) स्थापना करना।
  5. आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था के लिए जनहित में न्यास के अन्तर्गत न्यास कोष की स्थापना करना जिसमें विभिन्न वैधानिक उपायों से धन व चल-अचल सम्पत्ति की व्यवस्था कर समाज को अधिकाधिक लाभ पहुचाना।
  6. सनातन सिद्धान्तों को जन-जन तक पहुँचाना।
  7. वैश्विक चुनौतियों से निपटने, नवनवोन्मेष धर्मिता को बढ़ावा देने, वैश्विक संवाद स्थापित करने, राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय, सरकारी / गैर सरकारी संस्थाओं को विश्व शान्ति में सहयोग प्रदान करने, वैधानिक उपायों को सुझाना / प्रोत्साहित / जागरूक करना।
इस प्रकार उपर्युक्त प्रमुख उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए इस न्यास के प्रबन्धन एवं इसके सफल संचालन हेतु इसके अन्तर्गत न्यास परिषद् का गठन किया गया जो निम्नलिखित उद्देश्यों की सम्प्राप्ति हेतु न्यास पत्र में वर्णित नियमों/उपबन्धों के सर्वथा अधीन रहकर न्यास की श्रीवृद्धि कर रही है।

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Tuesday, 5 March 2019

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